एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद, निर्माण होने में लग गया था 80 वर्ष से अधिक

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ताजुल मस्जिद का निर्माण मुगल काल में हुआ था। शाहजांह बेगम (1844-1901) ने इसका काम शुरू करवाया था जिसको 1985 में मौलाना सैयद हशमत अली ने पूरा कराया।
शाहाजांहा बेगम ने शुरू कराया था काम

बाहदुर शाह ज़फर की हुकुमत में शाहजांहा बेगम ने इसका काम शुरू करवाया था। शाहाजांहा बेगम की म्रत्यु के बाद उनकी बेटी सुल्तान जहां बेगम ने इसका निर्माण कार्य जारी रखा। पैसों की कमी के कारण बाद में इसका निर्नाण कुछ समय के लिए रूक गया।

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लंबे इंतेज़ार के बाद फिर शुरू हुआ निर्माण

सन् 1971 में भोपाल के अल्लामा मोहम्मद इमरान खान नदवी अज़हरी और मौलाना सैयद हशमत अली साहब के कड़े प्रयासों से मस्जिद का निर्माण फिर से शुरू कराया । सन् 1985 में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ और इसके पूर्व दिशा का मुख्य प्रवेश द्वार का नवीनीकरण किया गया।

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मस्जिद में दो 18 मंज़िला ऊंची मिनारे हैं जो संगमरमर के गुंबज़ो से सजी है। इसके अलावा मस्जिद में तीन बड़े गुंबज़ भी है जो मस्जिद की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। मस्जिद के बीचो- बीच पानी से भरा एक बड़ा सा वज़ुखाना है। मस्जिद में एक बड़ा सा दालान, संगमरमर का फर्श और स्तम्भ हैं। मोतिया तालाब और ताज-उल-मस्जिद को मिलाकर मस्जिद का कुल क्षेत्रफल 14 लाख 52 हजार स्क्वेयर फीट है। ( बशुक्रिया एमसीसीआई)

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