सूखे की पड़ताल और घोषणा संबंधी केंद्र सरकार के दावों का स्वराज अभियान ने किया पर्दाफाश

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नई दिल्ली ( सा.भा. डेस्क ) पिछले 4 महीने से चल रहे स्वराज अभियान की सूखा राहत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी हो गयी। कुल 15 बार सुनवाई हुई जिसमें कि 40 घंटे सूखा संबंधी कई पहलुओं पर जाँच करते हुए न्यायालय ने अनेकों अवसरों पर सरकारों को अगम्भीरत और लचर रवैय्ये के कारण फटकार लगाई। अदालत ने सुनवाई पूरी करके फैसला सुरक्षित रखा है।

आज जब सुनवाई शुरू हुई तो स्वराज अभियान ने केंद्र सरकार के आंकड़ों की बाजीगरी को उजागर कर दिया। अभियान की तरफ से प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार के अपनी घोषणाओं के आधार पर भी देश के 43 करोड़ लोग सूखे से प्रभावित हैं जबकि केंद्र ने पिछली सुनवाई में यह कहा था कि ये संख्या 33 करोड़ है। यदि उन तीन राज्यों को भी गिना जाए जहां सूखा होते हुए भी सूखे की घोषणा नहीं हुई है तो यह आंकड़ा 54 करोड़ पहुंच जाता है। स्वराज अभियान ने सुप्रीम कोर्ट में आज यह साबित किया कि देश की 54 करोड़ आबादी सूखे की चपेट में है और केंद्र सरकार आंकड़ों की बाजीगरी करने में लगी है।

पिछली हर सुनवाइयों में केंद्र यह लगातार कहता रहा है कि सूखे की घोषणा करना सिर्फ राज्यों का काम है और केंद्र इसमें कुछ भी नहीं कर सकता। सरकारी वकील ने बार बार यह कहा था कि भले किसी राज्य की स्थिति कितनी भी गंभीर हो लेकिन केंद्र सूखे की पड़ताल और घोषणा नहीं करता। स्वराज अभियान ने आज इस सरकार के इस दावे की भी पोल खोल दी। सुप्रीम कोर्ट में यह साबित कर दिया कि केंद्र सरकार जिलावार सूखे की पड़ताल और घोषणा भी करता है, जिसपर अब तक सरकार ने पर्दा डाल रखा था। कृषि मंत्रालय के महालनोबिस सेंटर के द्वारा सूखे पर मासिक रिपोर्ट बनती है जो राज्यों को भी भेजी जाती है। स्वराज अभियान ने अदालत के समक्ष अक्टूबर 2015 की रिपोर्ट पेश की जिसमें सूखे की स्थिति के आधार पर जिलों का वर्गीकरण किया गया है। इस वर्गीकरण के लिए सभी उपलब्ध जानकारी को आधार बनाया जाता है। वर्ष 2015 में कुल मिलकर 205 जिलों को सूखाग्रस्त पाया गया था। स्वराज अभियान ने न्यायालय से प्रार्थना किया कि महालनोबिस सेंटर की रिपोर्ट के आधार पर हरियाणा, गुजरात और बिहार में उन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में आज सरकार ने यह माना कि आपदा प्रबंधन कानून के तहत सरकार को जो राष्ट्रिय आपदा योजना बनानी थी वो नहीं बनायी गयी। आपदा निवारण कोष नहीं बना और सूखे से निपटने के लिए कोई भी विशेषज्ञ बल सरकार के पास नहीं है। सरकार ने स्वराज अभियान की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह भी माना कि राष्ट्रिय आपदा राहत कोष की राशि आवंटन में देरी हुई और मनरेगा के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध करवाने में सरकार पूरी तरह सफल नहीं हुई। सरकार के लिए स्थिति और भी बुरी हो गयी जब स्वराज अभियान ने आंकड़ों की पोल खोल दी और सूखा घोषणा संबंधी केंद्र के पल्ला झाड़ने की कोशिशों को भी नाकामयाब कर दिया।

खेती, किसानी और गाँव के मुद्दों पर संघर्ष करने के लिए स्वराज अभियान ने जय किसान आंदोलन चलाया, भूमि-अधिग्रहण कानून में किसान विरोधी संशोधनों के खिलाफ पंजाब से दिल्ली तक किसानों का एक ट्रैक्टर मार्च किया जिसका समापन जंतर मंतर पर एक विशाल किसान रैली के रूप में हुआ। इसी रैली से घबराकर केंद्र सरकार ने योगेंद्र यादव समेत स्वराज अभियान के कई सदस्यों को गैर-कानूनी ढंग से गिरफ्तार कर लिया था।

स्वराज अभियान देश के लगभग 40% हिस्से में फैले भीषण सूखे से लोगों को राहत दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है। 2 अक्टूबर गांधी जयंती से योगेंद्र यादव के नेतृत्व में जय किसान आंदोलन ने देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों की संवेदना यात्रा करी थी और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को आने वाले गंभीर संकट से तत्काल निपटने के उपाय भी सुझाये थे। अभियान के सदस्यों ने कर्णाटक, तेलंगाना, मराठवाड़ा, विदर्भ, बुंदेलखंड, राजस्थान, हरियाणा जैसे सभी सूखाग्रस्त इलाकों में राहतकार्य किया और सरकारों पर दबाव बनाये। इन सब के बाद भी जब सरकारें सिर्फ दिखावी घोषणाएं करती दिखीं तो स्वराज अभियान ने देश के उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। इस संकट की घडी में सूखे से निपटने के लिए सबको एकजुट होना पड़ेगा और सरकारों को अपनी जवाबदेही समझनी होगी। स्वराज अभियान उम्मीद करता है कि सुप्रीम कोर्ट में 4 महीने चला सूखा राहत केस सरकारों को खेती, किसान, गाँव और सूखे के प्रति संवेदनशील बनाएगा।

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