इतनी महान थीं मुहम्मद स. की पत्नी ( ख़दीजा र. ) की आज के महिला आंदोलन की चमक उनके सामने लगती है फीकी

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विशेष लेख राजीव शर्मा की क़लम से प्यारे नबी स. जिन से मुझे मुहब्बत है – भाग – 47 :
नजरबंदी खत्म हुई, पर मुसीबतों का आना न रुका। एक संकट टलता नहीं कि दूसरे की बारी आ जाती। चाचा अबू-तालिब भी अब बीमार रहने लगे थे। कुरैश जानते थे कि वे मुहम्मद (सल्ल.) के बड़े हितैषी हैं, इसलिए उनसे एक बार मिला जाए ताकि वे कोई फैसला कर जाएं। जिंदगी का क्या, आज है, कल नहीं।

वास्तव में कुरैश की इच्छा किसी तरह के समझौते की नहीं थी। यह उनकी एक चाल थी। वे जमाने को यह दिखाना चाहते थे कि उन्होंने शांति व समझौते के द्वार बंद नहीं किए थे।

अगर वे किसी किस्म का समझौता करने में एक बार सफल हो भी जाते तो उस पर कायम नहीं रहते। अबू-तालिब की मौत के बाद वे समझौता तोड़ने का कोई मौका जरूर ढूंढ़ते।

वे यह पुख्ता करना चाहते थे कि उनकी छवि शांतिप्रिय लोगों जैसी बने और जो भी मुहम्मद (सल्ल.) के विरोधी हों, वे उनसे आकर मिल जाएं। इतिहास में कोई उन्हें यह न कह सके कि चाचा के रहते तो हिम्मत नहीं हुई। उनके गुजरते ही सब बहादुरी दिखाने लगे।

अबू-तालिब जीवन की आखिरी सांस ले रहे थे, तभी कुरैश के कुछ सरदार आ गए। वे मुहम्मद (सल्ल.) तथा उनके बीच न्याय करने की मांग करने लगे।

मगर बात बनी नहीं, कुरैश का अहंकार आड़े आ गया। आप (सल्ल.) कुछ नहीं चाहते थे, सिवाय इसके कि कुरैश यह मान लें कि अल्लाह के अलावा कोई और उपासना के योग्य नहीं है।

कुरैश तिलमिला उठे। वे चल दिए और कहते गए-

यह आदमी तुम्हारी कोई बात मानने वाला नहीं है। अब इसके साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार कर सकते हो। अब किसी को यह अधिकार नहीं कि वह हमें भला-बुरा कहे।

कुरैश सरदारों के ऐसे व्यवहार से अबू-तालिब को बहुत दुख हुआ। उन्होंने पूछा- प्यारे भतीजे, तुमने कुछ गलत तो नहीं कहा। फिर ये लोग क्रोधित क्यों हो गए?

आपने (सल्ल.) कहा- चाचा, कुरैश ने तो मेरी बात अस्वीकार कर दी, आप तो मना मत कीजिए। आप एक ही वाक्य कह दीजिए ताकि कयामत के दिन आपके पक्ष में गवाही दे सकूं। मेरे प्यारे चाचा, मात्र ला इला-ह इल्लल्लाह बोल दीजिए।

अबू-तालिब बोले, अरब के लोग ताना मारेंगे। वे कहेंगे कि अबू-तालिब मृत्यु से भयभीत हो गया। भतीजे, अगर यह आशंका न होती तो मैं तुम्हारी बात स्वीकार कर लेता। मैं बाप-दादा के धर्म में ही मरूंगा।

जब चाचा ने आपकी (सल्ल.) बात नहीं मानी तो बहुत दुख हुआ। उस समय यह आयत उतरी-

तुम जिसको चाहो, मार्गदर्शन नहीं दे सकते, बल्कि अल्लाह जिसको चाहता है, मार्गदर्शन देता है। वही भली प्रकार जानता है जो सन्मार्ग स्वीकार करने वाले हैं। (कुरआन, 28 : 56)

अबू-तालिब का देहांत हो गया। वे हमेशा आपके (सल्ल.) लिए फिक्रमंद रहे। हर संकट के समय मजबूत ढाल बनकर खड़े रहे। अपनी संतान की तरह भतीजे को पाला, अपनी औलाद से बढ़कर माना। उनके गुजर जाने से मुहम्मद (सल्ल.) कुरैश के सीधे निशाने पर आ गए।

यह दुखद घटना हुई थी कि कुछ दिनों बाद खदीजा (रजि.) का भी देहांत हो गया। आपकी वफादार पत्नी खदीजा (रजि.)। सुख-दुख की सच्ची साथी खदीजा (रजि.)। सबसे पहले रब पर ईमान लाने वाली खदीजा (रजि.)। वह भी साथ छोड़कर चली गईं। उन्होंने हमेशा आपकी (सल्ल.) कोशिशों को सहारा दिया। उनका योगदान बहुत महान था।

खदीजा (रजि.) का देहांत रमजान में हुआ था। उन्हें हज्न नामक स्थान पर दफनाया गया। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) खुद उनकी कब्र में उतरे थे। मृत्यु के समय उनकी आयु 65 वर्ष थी।

चाचा अबू-तालिब के देहांत के बाद खदीजा (रजि.) के यूं चले जाने से मुहम्मद (सल्ल.) अकेले पड़ गए। इतिहास के अनुसार वह दस नबवी का जमाना था। इसे इस्लाम का बहुत कठिन जमाना कहा जाता है। मुहम्मद (सल्ल.) भी फरमाते थे कि यह गम का साल है। आप (सल्ल.) गमगीन रहा करते थे।

मेरी नजर से पढ़िए
यह अध्याय मैं उस महान महिला के नाम करता हूं जिसे मुहम्मद (सल्ल.) की जीवनसाथी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मगर आज जब हम साहित्य की दुनिया में देखते हैं तो पाते हैं कि खदीजा (रजि.) को लोगों ने उस तरह नहीं जाना, जैसा कि उन्हें जानने-समझने की और जरूरत थी।

उनका व्यक्तित्व सिर्फ एक धर्म तक ही सीमित रखा गया। खासतौर से हिंदी में उपलब्ध साहित्य खदीजा (रजि.) की चर्चा बहुत कम करता है। उन्हें वैसा स्थान नहीं मिल सका, जिसकी वे हकदार थीं।

उन्हें पढ़ो तो आश्चर्य होता है। वे जिस जमाने में पैदा हुईं, जैसी परिस्थितियां तब मौजूद थीं, उनके बीच वे बहुत आधुनिक महिला कही जा सकती हैं। वे कारोबार करती थीं और बहुत सफल कारोबारी थीं। अपने फैसले सूझबूझ से खुद लेती थीं।

मुहम्मद (सल्ल.) के साथ उनका विवाह हुआ तो वे बहुत आदर्श पत्नी साबित हुईं। वे बहुत स्वतंत्र विचारों वाली महिला थीं। स्वतंत्र इस अर्थ में नहीं जैसे कि आज स्वतंत्रता की नई-नई परिभाषाएं बनाई जा रही हैं।

खदीजा (रजि.) ने कारोबार में नाम कमाया तो वे दानशील भी बहुत थीं। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) के साथ विवाह से पूर्व भी उनकी बहुत ख्यााति थी। वे समझदार, बहादुर, उत्तम चरित्र वाली महिला के नाम से जानी जाती थीं। लोग उनकी नेक नीयत व विचारों की तारीफ किया करते थे।

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कई धनवान, प्रभावशाली सरदारों के प्रस्ताव ठुकराकर मुहम्मद (सल्ल.) को विवाह प्रस्ताव भिजवाना यह साबित करता है कि वे गलत और सही में फर्क करना खूब जानती थीं। मुहम्मद (सल्ल.) भी मिसाली शौहर थे। आप (सल्ल.) धर्मपत्नी के हर काम में सहयोग देने के लिए तत्पर रहे। उनके कारोबार को बुलंदियों तक पहुंचाया, उनके हर अधिकार का पूरा सम्मान किया।

एक बात का मैं अक्सर जिक्र करता हूं और इस किताब में पहले भी लिख चुका हूं। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) और उनकी धर्मपत्नी के जीवन को गौर से पढ़ो तो मालूम होता है कि दोनों अपने अधिकारों से ज्यादा कर्तव्यों को महत्व देते थे। जिस रिश्ते में लोग कर्तव्य निभाने पर जोर दें, वहां अधिकार मांगने की नौबत कभी नहीं आती।

आज तो लोग पति-पत्नी के रिश्ते को बाजार का सामान समझ बैठे हैं, जिसे वे दाम चुकाकर खरीदने का दावा करते हैं। पुरुष जोर-जबर्दस्ती को अपना अधिकार मानता है तो महिला आजादी के नाम पर ऐसी चीजों के आकर्षण में उलझी है जो उसी के घर में आग लगा रही हैं।

पति-पत्नी का रिश्ता हो तो मुहम्मद (सल्ल.) व खदीजा (रजि.) जैसा, जिसे एक बार पढ़ो तो हमेशा पढ़ने का दिल करता है। ऐसे होते हैं आदर्श दंपत्ति, जो एक-दूसरे की प्रगति में भागीदार बने, एक-दूसरे का पूरा सम्मान करते रहे।

यहां रिश्तों में टकराव नहीं बनाव है। यहां रिश्ते का नाम मैं नहीं हम है। यहां अधिकारों का अहंकार नहीं, कर्तव्य की पुकार है। ऐसा रिश्ता हो तो उसे कौन नहीं सराहेगा? धन्य हो खदीजा (रजि.), आप दुनिया को रिश्तों की कद्र करना सिखा गईं।

शेष बातें अगली किस्त में

– राजीव शर्मा –
गांव का गुरुकुल से

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