भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित से दीक्षित दनकौरी तक का सफ़र

dixit dankauri

नई दिल्ली ( सदा ए भारत ) ग़ज़ल एक एहसास है अगर आपके आस पास कही से भी हो कर गुज़रे तो आपको अपनी खुशबूं में समेट लेता है कुछ ऐसा ही ताज़ा तरीन हसीन फूलों का गुलदस्ते का नाम है दीक्षित दनकौरी .

गुलदस्ता इसलिए क्योंकि इस गुलदस्ते की खुशबू देश ही नही विदेशों में भी फैली है भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित का जन्म ऐसी मिट्टी में हुआ जिसमें शायरी की महक रची बसी हुई है यानि उनका जन्म अमरोहा में हुआ था उसके बाद उनका बचपन, शिक्षा दनकौर में हुई और घर के लगभग सभी सदस्य संगीत व कवि सम्मलेन के शौकीन थे इसी समय उन्हें ग़ज़ल से मुहब्बत हो गई और भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित अब दीक्षित दनकौरी हो गये ,पहला ग़ज़ल संग्रह “डूबते वक्त” नाम से आया जिसके कई संस्करण प्रकाशित हुए l

बहुत ही काम समय में हिंदी उर्दू साहित्य को मालामाल करना, हिंदी उर्दू को एक डोर में बांध कर रखना ये काम केवल दीक्षित दनकौरी ही कर सकते हैं l दीक्षित दनकौरी पिछले 8 वर्षों से जनवरी के दूसरे शनिवार को दिल्ली में “ग़ज़ल कुम्भ” कार्यक्रम का आयोजन करवाते हैं इसमें देश के शहरों व गावं से नए पुराने ग़ज़लकार शिरकत करते हैं लगभग 800 ग़ज़लकार की ग़ज़लों को संकलित कर “ग़ज़ल दुष्यंत के बाद” संग्रह तैयार किया है इसमें हिंदी उर्दू के छोटे और बड़े ग़ज़लकार की ग़ज़लों के साथ उनके छायाचित्र और परिचय भी उपलब्ध है l यह संग्रह इतना लोकप्रिय हुआ कि इसके 3 खंड आ चुके हैं और चौथा पर काम जारी है l पूज्य संत मुरारी बापू जी के पसंदीदा शायरों में दीक्षित दनकौरी का नाम भी शामिल है

दीक्षित दनकौरी के चुनिन्दा आशआर —
रंजिश है उसको मुझ से,मगर ये कमाल है दुश्मन भी मेरे उसने ठिकाने लगा दिए

एकता के सभी पक्षधर हो गये
कुछ इधर हो गये कुछ उधर हो गये

शेर अच्छा बुरा नहीं होता
या तो होता है, या नहीं होता

ये दुनिया जो प्यार देती है
ब्याज पर ही उधर देती है

जुल्म कि इन्तह न हो जाये
बावफा , बेवफा न हो जाये

चाहता हूँ अमीर हो जाऊं
तेरे दर का फ़क़ीर को जाऊं

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