मैं संपुर्ण मुसलमान बनना चाहती थी फिर मैं ने रोज़ा रखना और क़ुरआन पढ़ना शुरू किया और बन गई : विक्टोरिया एडवर्ड्स

अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबराकातुह,

मेरा नाम विक्टोरिया एडवर्ड्स है। मैं इस्लाम में आने से पहले एक नास्तिक थी, मैं ईश्वर और क़यामत के दिन फिर से उठाए जाने को बिलकुल भी नहीं मानती थी। इसी वजह से मैंने कभी भी किसी धर्म को जानना चाह तो मैं हमेशा ही निष्पक्ष रही। पर मैं यह सोचती थी की आखिर ऐसा क्या है जो पूरी दुनिया ईश्वर को मानती है। और ऐसा कौन है जो उनको ईश्वर को मानने को कहता है। मैं यह सच्चाई जानने के लिए उत्तेजित हो रही थी।

सबसे पहले मैंने बौध्द धर्म को जानना शुरू किया। पर इस धर्म में मुझे कुछ समझ नही आया क्योंकि बौध्य धर्म में ईश्वर की कोई बात होती ही नही है। बौद्ध धर्म में सिर्फ नैतिकता की ही बात होती थी। पर इस्लाम में ऐसा नहीं था इस्लाम एक पूरा धर्म था।

वर्ष 2011 में मैं मलेशिया चली गई। और वहां पर मेरा एक दोस्त था और वह कनाडा से आया था और मैंने अपने घर पर पार्टी रखी थी। और फिर मैं अपने दोस्तों को लेकर अपने घर के ऊपर गई जिससे की मैं उनको अपना पूरा घर दिखा सकूँ। और जब मैं एक कमरा दिखाकर उन लोगों को दुसरे कमरे में ले जाने लगी तभी एक धमाका हुआ। पर मैंने उस पर उतना ध्यान नही दिया। पर जब मैं नीचे गई तो मैंने देखा की मेरी एक दोस्त थी वह बहुत डरी हुई लग रही थी। जब मैंने उससे पूछा तो उसने कहा की तुम्हारा कुत्ता मर गया मैं चौंक गई। मैंने कहा की कैसे हुआ ये सब तो उसने कहा की अचानक से दरवाज़ा बन्द हुआ और वह बीच में ही दब गया। फिर हम सब डरे हुए थे हमको लग रहा था की यह किसी भूत का काम है। हालांकि, हम एक विज्ञान के छात्र थे पर फिर भी।

फिर वह सब चले गए और कुछ महीने ऐसे ही बीत गए। पर मेरे घर में हमेशा ही कुछ न कुछ होता रहता। जैसे की कभी कुछ अपने आप गिर कर टूट जाता तो कभी घर का दरवाज़ा अपने आप खुल जाता। एक बार मैं रात के 2 बजे तक अपने कमरे में आई और मैं सोने के लिए तयारी करने लगी। फिर जब मैं लेटने जा रही थी मुझे ध्यान आया की मैंने लाइट तो बन्द ही नही की है। और फिर मैं दरवाज़े के बहार लाइट बन्द करने चली गई और जब मैं बाहर गई तब मुझे ऐसा एहसास हुआ की वहां कोई भूत है। हाँ, मैं जानती हूँ की यह फ़ालतू की बात है। पर मेरे साथ ऐसा ही हुआ। पर मुझे ऐसा लग रहा था की कुछ न कुछ तो गड़बड़ थी।

तभी उस समय मैंने एक अजीब सी आवाज़ सुनी। मैं जानती हूँ की आप मुझको यह सब पढ़ कर मुझे पागल समझेंगे, पर यही सच है। मैंने एक बात और गौर की कि मेरे घर की दीवार में एक छेद था मुझको ऐसा लगा की उसमे से मुझको कोई देख रहा है। यह देख कर जैसे लग रहा था की मेरा दिल बाहर आ जाएगा। मैं घर में अकेली थी और मैं बहुत ज़्यादा डर रही थी। पर मैंने हिम्मत कर के दरवाज़े को बन्द किया और जैसे ही मैं बेड पर जाने के लिए मुड़ी वैसे ही किसी ने दरवाज़े पर काफी ज़ोर से मारा।

उस समय मैं एकदम असहाय थी और मैं बहुत ज़्यादा डरी हुई थी मैं कुछ कर भी नहीं सकती थी। मैं अकेले ही उस कमरे में बन्द थी और मुझे कुछ समझे नही आ रहा था की बाहर कौन है। ऐसे समय में जब मैं य यह तक नही जानती थी की मैं क्या कर और बाहर कौन है। मेरा दिमाग जैसे कहीं खो गया था। और उस समय मैंने जो थोड़ी बहुत धर्म की पढ़ाई की थी उससे मुझे कोई नहीं याद आया मुझे अगर किसी का नाम याद आया तो वह अल्लाह(सु.व.त.) का नाम था। मुझे उस समय न गॉड न बुद्धा किसी पर विश्वास नही था।

मैंने बहुत से ईश्वर और अलग अलग धर्मों के बारे में पढ़ा था पर मुझे किसी का नाम याद नही आया सिवाए अल्लाह के। पर सब का ऐसा कहना है की मुझे अल्लाह(सु.व.त.) पर सिर्फ इसलिए भरोसा था क्योंकि मैं एक मुसलमान देश में रहती थी। पर मैं कहती नही ऐसा कुछ नही है। मुझे नहीं लगता की इसका कोई भी ऐसा असर होता होगा। क्योंकि आम समय की बात अलग होती है पर बुरे समय में इंसान जिसपर भरोसा करता है उसी को याद करता है। तो मैंने उसी समय अल्लाह से कहा की अल्लाह अगर आप हैं तो आप मेरी मदद करिये। और आप भी समझ सकते हैं की अगर ऐसा कुछ होता है तो कोई जल्दी सो नहीं सकता।

मैं अपनी बेड पर लेट गई और अपने लैपटॉप में कुछ देखने लगी, जिससे मेरा ध्यान बटे। फिर मैं लैपटॉप में देखते ही देखते सो गई और जब मैं सुबह जागी तब मैं सोचने लगी की रात में आखिर हुआ क्या था?

और फिर मैं सोचने लगी की सच में अल्लाह ने मेरी बहुत मदद की। और शायद अल्लाह को यही मंज़ूर था की मैं मुसलमान हो जाऊं। और मेरे जीवन के 22 साल मैंने एक नास्तिक की तरह बिताए थे।

मैं आगे चल कर इस्लाम को लेकर बहुत उत्सुक हो रही थी। और मैं लोगों से पूछने लगी की अल्लाह क्या बोलते हैं और हमसे क्या चाहते हैं। तो उन्होंने मुझको बताया की अल्लाह सबसे पहले सब्र करने को बोलता है। तो मैंने सब्र करना शुरू कर दिया और मैं छोटी-बड़ी हर बातों में अपने आप पर काबू रखती और सब्र रखती थी।

कुछ महीनों तक मैंने ऐसा ही किया और फिर रमज़ान का महीना आ गया मैंने सोचा की अब मुझको रोज़ा रहना चाहिए क्योंकि इसी से पता चलेगा की मैं मुसलमान हो सकती हूँ या नहीं। और मुझको बताया गया की इस्लाम में सूअर का मांस और शराब नहीं पी सकते हैं। फिर मैंने सोच लिया की मैं अब ये सब नही करुँगी और मैं रोज़ा रखने के लिए अपनी पूरी मेहनत करुँगी।

मैं इस्लाम की बातों से इतना प्रेरित हो चुकी थी की मैं एक सम्पूर्ण मुसलमान बनना चाहती थी। तो मैंने रमजान में रोज़ा रखना शुरू कर दिया और मैं इन्टरनेट पर इस्लाम के बारे में सीखती रही। और मैं क़ुरआन भी पढ़ती थी। मुझे क़ुरआन में बहुत सी ऐसी बातें नज़र आईं जो की बहुत अच्छी थी। क़ुरआन में कोई भी बात ऐसी नहीं मिल सकती जिन पर शक़ किया जा सके। मैं रोज़ क़ुरआन की एक सूरह पढ़ती थी। क़ुरआन में बहुत सी अच्छी बातें कहीं गई हैं जो की पूरी इंसानियत के लिए एक सही रास्ता है।

मैंने अपना पहला रमज़ान का रोज़ा रख लिया पर मुझे थोड़ी बहुत मुश्किल हुई। पर मैंने पूरी हिम्मत की और मैं रोज़े रही। हालांकि उस समय मैंने शहादह नही पढ़ा था। पर एक दिन मैंने ईशा की नमाज़ पढ़ी और मैंने फिर शहादह पढ़ लिया। सौ. मई ज़ाविया

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