सेकुलर पार्टियों के शीश महल पर भाजपा का पथराव : विशेष लेख

विशेष लेख. मुहम्मद शाहनवाज.

यूपी विधानसभा चुनाव का परिणाम सामने आ चुका है, भाजपा की 325 सीटों से शानदार जीत हुई है, स्पा, कांग्रेस गठबंधन को केवल 55 सीटों में सफलता मिली, जबकि बहुजन समाज पार्टी 18 सीटों में सिमट कर रह गई। उक्त परिणाम के अनुसार सपा कांग्रेस गठबंधन और बसपा को बुरी तरह से पराजित मिली। हालांकि इन दोनों में से किसी को इस तरह की हार और नाकामी की उम्मीद नहीं थी.जब चुनाव की शुरुआत हुई थी तो राजनीतिक गलियारों में देखी जाने वाली जीत की चहल पहल स्पा कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में थी। उन्हें इतना विश्वास और यकीन हो चुका था कि अगले पांच सालों में यूपी की हुकूमत हमारे ही हाथों में होगी, पिछले चुनाव के मौके पर हमने जो काम किया है उसका लाभ हमें इस चुनावों में शानदार जीत और सफलता के रूप में मिले जाएगा। जिनमें से सरकारी स्कूल्स और मदरसों के छात्रों को लैपटॉप का तोहफा दिया जाना, जगह जगह सड़कों की जाल बिछा देना, साथ ही राजधानी लखनऊ में मेट्रो ट्रेन की पेशकश मौजूदा चुनाव में काफी सफलता दिलाने की गवाही दे रहे थे। उधर बहनजी मायावती ने कांग्रेस गठबंधन से घबराकर मुस्लिम उम्मीदवारों को अधिक से अधिक टिकट प्रदान करके एक नई चाल चलने की कोशिश की थी। इस राजनीतिक दांव पैच का सराहना मुस्लिम पार्टियों में देखा गया, विशेष रूप से मौलाना आमिर रशादी इस पेशकश को स्वीकार करते हुए बहुजन समाज पार्टी को वोट देने के लिए मुसलमानों से विशेष अपील भी की थी। रही सही कसर मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असद ओवैसी ने जय भीम, जय मीम का नारा लगाकर पूरी कर दी। बेचारे भाजपा न तो उसके पास कोई शानदार मुद्दा था न ही कोई राजनीतिक नारा था जिसके दम पर यूपी के दंगल में बाजी मारने का दावा करती ले दे कर तीन तलाक का मुद्दा था जिस मे इतना दमखम नहीं था जो मुस्लिम वोट को लुभा सकते और अपनी सफलता का दावा कर सकते थे।

भाजपा के अलावा सभी धर्मनिरपेक्ष दलों के पास उसके खिलाफ कई सबूत थे जिनका जिक्र उन्होंने अपनी चुनावी रैलियों में जमकर किया, 2014 में अच्छे दिन लाने का चकमा देकर सत्ता पर विराजमान हो जाना और बदले में जनता के लिए कुछ नहीं करना, पेट्रोल डीजल और गैस की कीमतों के साथ साथ लगातार अनाज, दाल, चावल और अन्य दैनिक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि, रेल किराया में मनामानी आदि के चुनावी सभाओं में खूब खूब जिक्र किया गया। इन सब बातों से बढ़कर नोट बन्दी का क्रोध था, जिनकी वजह से मचने वाली तबाही की अब तक भरपाई नहीं हो सकी है। जिससे डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जानें गई थीं भारत में ऐसा कोई मनुष्य नहीं था जिन्हें नोट बंदी के प्रभाव से प्रभावित नहीं होना पड़ा, उन लोगो के अलवाह जो पहले से ही अपनी नोट बैंक में जमा कर चुके थे।

बहरहाल भाजपा के सभी विरोधी दलों ने सभी दोषों से पर्दा उठाया। लोगों को भाजपा की मानसिक और बौद्धिक गुमारही के साथ साथ लापरवाही व मन मानी से जागरूक किया। और अपने पक्ष में वोट का इस्तेमाल करने की जबरदस्त अपील की। लेकिन अगर भाजपा की बात की जाए तो मौजूदा चुनाव में इतना दोषी व आरोपी थी कि वह हर तरह से पापी साबित हो रही थी। उसे अपने अपराध का एहसास था, इसलिए लोगों को भ्रमित करने के लिए कोई मुद्दा नहीं था। अच्छे दिन बुरे हो चुके थे, राम मंदिर निर्माण का मुद्दा बहुत ही घिसा पिटा हो चुका था, आदि। इन्हीं कारणों से जनता से कोई वादा नहीं कर पा रही थी ले देकर तीन तलाक का मामला था इस्का उल्लेख तो किया गया लेकिन यह इतना आकर्षक नहीं था जिस के छल में आकर लोग भाजपा को वोट देते।

उधर दिल्ली और बिहार में करारी हार का डर सता रहा था कि केंद्र में सत्ता संभालने के बावजूद दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा पर आम आदमी पार्टी की झाड़ू चल चुकी थी। ऐसी करारी हार मिली जो दीपक तले अंधेरा की तरह साबित हुई। इसके बाद दूसरा झटका बिहार विधानसभा चुनाव में लगा था जहां योजना बन्ध तरीके से भाजपा के खेमे को जड़ से उखाड़ फेक दिया था। इन दो गंभीर झटके के बाद यूपी चुनाव में पंजा आज़माना जुए शेर लाने के बराबर था.गोया कि परिस्थितियों के संदर्भ में भाजपा का यह चुनाव हारना बिल्कुल तय था। इसके बावजूद भाजपा का युपी विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक सफलता की मिसाल खड़ी कर देना समझ से ऊपर है।

इस सिलसिले में तबसरा करने का कहना है कि भाजपा ने जिस तरह से अपनी सारी खामियों के बावजूद चुनाव का मोर्चा संभाला है वह काबिले तारीफ है। वह इस तरह कि प्रधानमंत्री से लेकर सभी केंद्रिये मंत्री लगातार चुनावी सभाओं को संबोधित किया है, उनके पास भले ही कोई अच्छा मुद्दा नहीं हो लिकन जिस तरह की बयानबाजी का सहारा लिया है वह जीत दिलाने का सही साधन था, वह व्यंग्य वचन का अधिक इस्तेमाल किया। राहुल और अखिलेश की जबरदस्त खीचाई की। ऐसे वाक्य और शब्द का इस्तेमाल किया जिन्हें सुनकर जनता उनके झांसे में आगए. इस मामले में हमारे प्रधानमंत्री भी किसी से कम नहीं है.खास रूप से योगी आदित्य नंद ने के ज़हरीले बयान आग में घी डालने का काम किया।

दूसरी बात यह कि भाजपा ने इस चुनाव में अपनी प्रचार के लिए सोशल नेटवर्क का जमकर सहारा लिया। उन्होंने इसके लिए एक समिति का गठन किया था। जो हर दिन के चुनावी रैलियों को फेसबुक वाट्स ऐप और ट्यूटर के जरिए लोगों को सीधे पहुँचाते थे। जो जनता बर बड़ा प्रभाव पड़ा, साथ ही उन्होंने टीवी खूब खूब इस्तेमाल किया, सब टीवी चैनलों ने भाजपा के पक्ष में जनता को अच्छा रुजहान पेश किया। बल्कि यही वह हथियार था जो लोगों के अपनी ओर आक्रषित करने और भाजपा के समर्थन में वोट करने में प्रभावी भूमिका निभा क्यो कि इस व्यस्त दुनिया में लोगों के पास तथ्यों को जाने के लिये इतना समय नहीं है कि जमीनी हकीकत पर चर्चा करे। इसलिए टीवी में जो जानकारी प्रदान की जाती हैं उसी पर लोग विश्वास और भरोसा करते हैं। चुनाव के मौके पर मीडिया चैनलों ने मुसलमानों के खिलाफ नफर्ति वातावरण बनाने के लिए आतंकवादी पे खूब बहसें कीं। वहीं तारिक फतेह का जी न्यूज में साप्ताहिक कार्यक्रम जारी कर पाकिस्तानी और भारतीय मुसलमानों के खिलाफ जहर घोलने की कोशिश की जिससे जेह्नी तौर पर हिंदू समुदाय को निराश किया गया। और प्रधानमंत्री की प्रशंसा और विज्ञापन में बढा चढा कर काम लिया गया।

इसी तरह यूट्यूब में भी वीडियो चलने से पहले भाजपा की प्रचार होती थी। लेकिन उनके अलावा किसी भी पार्टी ने इस तरह से मीडिया और टीवी चैनलों और सोशल नेटवर्क का सहारा नहीं था। रही बात स्पा, कांग्रेस गठबंधन की तो अखिलेश यादव, डिंपल यादव और राहुल गांधी कितनी मेहनत करेंगे। उनके पास चुनावी सभाओं में अपना जलवा बिखेरने के लिए अधिक चेहरे नहीं थे। जो अपनी चरब जबानी द्वारा लोगों को आकर्षित करते हैं।

इसमें कोई शक नहीं कि यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत में मुस्लिम और दलित वोटों की चो तरफा विभाजित है। गौरतलब है कि मौजूदा चुनाव में चार बड़ी पार्टियां राजनीतिक मैदान में थीं, स्पा कांग्रेस के एकजुट होने से तीन पार्टियां रह गई . इन में से भाजपा का अपना वोट बैंक था जो आरएसएस, हिंदुत्व के साथ बहुसंख्यक के लोग थे। जो किसी भी हालत में भाजपा के खिलाफ नहीं जा सकते थे। लेकिन भाजपा के अलावा जितनी भी पार्टियां हैं सब किसी की जीत का दारोमदार केवल मुस्लिम, दलित और अल्पसंख्यक वोट था। धर्मनिरपेक्ष दलों ने जिस तरह की राजनीति की है उससे तो भाजपा की जीत तय थी ही। अगर यहां भी भाजपा को हराना मंजूर था तो धर्मनिरपेक्ष पार्टी को बिहार का राजनीतिक मॉडल अपनाना था, जहां भाजपा की अनथक प्रयास के बावजूद भी पराजित हुई। जिस तरह सपा और कांग्रेस में गठबंधन हो चुका था मायावती जी को भी इसी गठबंधन से जड़जानी चाहिए थी। हालांकि एक्जिट पोल में भाजपा के बहुमत को देखने के बाद मायावती ने सपा, कांग्रेस गठबंधन के साथ और अखिलेश ने बसपा के साथ हाथ मिलाने के लिये मीडिया के सामने घोषणा की थी। अगर यह गठबंधन चुनाव से पहले हो जाता तो बिहार ही तरह यूपी विधानसभा चुनाव में भी भाजपा को दूध से मक्खी की तरह निकाल बाहर कर दिया जाता। जिसका असर केवल आगामी सभी चुनावों में दिखाई देता है और विशेष रूप से 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सबसे खराब हार का सामना करना पड़ता।

धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का आपस में एकजुट न होना ही भाजपा को ऐतिहासिक जीत हासिल करने का अवसर प्रदान किया है। भाजपा ने हाल के चुनाव मे 320 सीटें हासिल की हैं हालांकि भाजपा यूपी में 1985 से चुनाव लड़ रही है। पहले चुनाव में उसने यूपी में 16 सीटें जीती थीं .2017 के चुनाव में भाजपा ने 1991 का रिकॉर्ड तोड़ दिया। इस बार इसे 300 से अधिक सीटें मिली हीं.राम मंदिर मुद्दे पर भाजपा को 1991 में 221 सीटें मिलीं और कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनी। 1980 में यूपी में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 309 सीटें मिली थीं। अब 37 साल बाद ऐसा हुआ है कि किसी पार्टी को 300 से जियादा सीटें मिली हैं।

भाजपा की शानदार जीत से यह राय कायम की जा रही है कि अब केंद्र और राज्य सरकार मिलकर मुसलमानों के खिलाफ माहौल तैयार करेगी। और मुसलमानों के खिलाफ जितने इरादे तय किए गए हैं उन्हें अमल मे लाने की कोशिश करेगी। ऐसी स्थिति में हम मुसलमानों को ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है जितना डर आज भाजपा, आरएसएस और मोदी लहर से महसूस हो रहा है इतना अगर अल्लाह तआला से हो जाए तो फिर यह क्या है, अगर दुनिया में कोई फिरौन जीवित होकर ख़ुदाई का दावा करेगा तो अल्लाह उसे समुंद्र मे डुबा देगा, यदि कोई नमरूद जन्म लेकर अल्लाह तआला के खिलाफ मोर्चा खोलेगा तो मामूली सा मच्छर द्वारा उसका ठिकाना लगाया जाएगा। अगर कोई कारुन, हामान शद्दाद और अबरअह से बढ़कर अत्याचारी राजा भी मुसलमानों के खिलाफ कोई योजना करेगा तो अल्लाह उसे कहीं का नहीं रख्खे गा। बशर्तया कि मुसलमान अपने साम्प्रदायिक मतभेद उपर उठ कर कुरान और सुन्नत का पालन करते हुए अल्लाह की इबादत मे के मुनहमिक हो जाएं।

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