आज़ादी के बाद मोदी शासन काल में सबसे अधिक बने ‘आईएएस’ मुसलमान

नई दिल्ली ( एस.बी.डेस्क ) भारत की प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में इस साल आज़ादी के बाद से सबसे ज़्यादा मुसलमान उम्मीदवार चुने गए हैं.

इस साल परीक्षा पास करने वाले कुल 1099 उम्मीदवारों में से क़रीब 50 मुसलमान हैं.
ये संख्या आज़ादी के बाद से सबसे ज़्यादा है. बीते साल सिविल सेवा परीक्षा में कुल 1078 उम्मीदवारों का चयन हुआ था जिनमें से 37 मुसलमान थे.
इस साल शीर्ष 100 उम्मीदवारों में से से 10 मुसलमान हैं जबकि बीते साल सिर्फ़ एक मुसलमान उम्मीदवार ही शीर्ष 100 में जगह बना पाया था.
इस साल कुल चयनित उम्मीदवारों में 4.54 प्रतिशत मुसलमान हैं. ये आंकड़ा आज़ादी के बाद से सबसे ज़्यादा है.
यही नहीं जम्मू-कश्मीर से भी इस बार कुल 14 लोग सिविल सेवा के लिए चुने गए हैं जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है.
कश्मीर के बिलाल मोहिउद्दीन भट्ट इस साल दसवें नंबर पर आए हैं।

2006 में भारतीय मुसलमानों के हालात पर आई जस्टिस सच्चर समिति की रिपोर्ट में बताया गया था कि सिविल सेवा में मुसलमान सिर्फ़ तीन प्रतिशत हैं जबकि पुलिस सेवा में ये संख्या चार प्रतिशत है।

इस साल की परीक्षा में मेवात के रहने वाले 28 वर्षीय अब्दुल जब्बार भी चयनित हुए हैं जो 822वें नंबर पर आए हैं. वे इस क्षेत्र से पहले मुसलमान सिविल सर्वेंट हैं.
पिछले कुछ सालों में सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले मुसलमानों की संख्या लगातार बढ़ी है –
परीक्षा वर्ष कुल चयन मुसलमान उम्मीदवार
2016 1099 50 (लगभग)
2015 1078 37
2014 1236 40
2013 1122 34
2012 998 31
2011 910 29

2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक भारत में मुसलमानों की कुल आबादी 14.23 प्रतिशत है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सरकारी नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिशत 8.57 है जबकि प्राइवेट नौकरियों का आंकड़ा नहीं रखा जाता है।

ऐसे में भले ही इस साल सिविल सेवा में मुसलमानों की कामयाबी को उम्मीद की किरण के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन बराबरी तक पहुंचने में अभी मुसलमानों को लंबा फ़ासला तय करना है।

आज भी मुसलमानों की बड़ी आबादी ग़रीबी में रहती है और शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मुसलमानों की पहुंच से दूर हैं।
भारत में इस समय दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासनकाल में प्रतिष्ठित सिविल सेवा में मुसलमानों का रिकॉर्ड प्रतिशत से पास होना लगातार हाशिए पर जाते दिख रहे इस समुदाय के लिए एक उम्मीद की किरण जैसी बात नज़र आती है। साभार बीबीसी

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