जब पंडित जी को मुसलमानों के मात्र भाषा उर्दू से नफरत नहीं थी तो आज तुम लोग नफरत क्यों फैला रहे हो

नई दिल्ली ( एस.बी.विशेष ) जब लाहौर के मुसलमानो को 1931 में वंदे मातरम पर कोई आपत्ति नहीं थी तो अब भारत में क्यों? कुछ ऐसे ही सवालों को लेकर कुछ तथाकथित राष्ट्र भक्त वंदेमातरम् बोलने के लिए लोगों को मजबूर करते हैं। लेकिन जिस दैनिक अखबार “बन्दे मातरम” को राष्ट्र भक्त आधार बना रहे हैं वह अखबार भले ही उर्दू भाषा में छपता था पर उसके संपादक थे एक हिंदू पंडित “पंडित करमचंद शुक्ल” तथाकथित राष्ट्र भक्त जो वंदेमातरम् के लिए इतने पुराने अखबार को आधार बना रहे हैं तो क्या लाहौर के मुसलमान भारतीय मुसलमानो से ज्यादा देश भक्त हैं।

आज राष्ट्र भक्त जो स्मारक,सड़क से लेकर स्टेशनों तक से मुसलमानो का नाम मिटाने की कोशिश कर रहे हैं जरा गौर से देखो जिस अखबार को दलील बना रहे हो वह उर्दू में है जो तुम्हारे पंडित जी का है जो भारतीय मुसलमानो की माद्री भाषा है। फिर जब तुम्हारे पंडित जी को मुसलमानो की मात्तर भाषा उर्दू से उस समय नफरत नही थी तो तुम लोग आज नफरत क्यों फैला रहे हो।

राजनीति के लिए जो तुम कर रहे हो इस से मुसलमानो से ज्यादा हिदू भाईयों का नुकसान है। तुम्हारी इस घटिया राजनीति के कारण भारत पिछड़ रहा है बेरोजगारी, भ्रष्‍टाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य, मंहगाई तथा अन्य कई महत्वपूर्ण मुद्दे हिंदुत्व की आड में जस के तस हैं। और सभी भारतीयों को गाय, वंदेमातरम्, इत्यादि में उलझा कर तुम भक्तों के गुरू संयासी का चोला पहनकर राजा महाराजाओं जैसा सुख भोग रहे हैं।

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *